Thursday, March 16, 2017

आभामंडल

1. आभामंडल परिचय

आभामंडल परिचय
कहते हैं मन खुश हो तो सब अच्छा लगता है और यदि मन ही उदास हो तो जीवन में कोई रस नहीं दिखता। रोजाना एक जैसे दिनचर्या बिताने वाले लोगों के लिए मन के उतार-चढ़ाव का होना आम बात है। लेकिन अचानक किसी में एक अलग चमक देख हैरानी होती है और मन में सवाल आता है कि वह आज खुश कैसे है, क्या कुछ बात हुई, उसके निखरे हुए चेहरे का क्या राज है? आखिर क्या है जो आज उसके आसपास सब कुछ काफी चमकदार सा लगता है। इसका कारण जान आप दंग भी रह सकते हैं।

2. शरीर की ऊर्जा

शरीर की ऊर्जा
जिस तरह आपका मन आपके शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है, उसी तरह से आपका शरीर भी आपके मन को एनर्जी देता है। यही कारण है कि कई बार लोग काफी खुश प्रतीत होते हैं। उनके चारो ओर का वातावरण खुशनुमा लगता है। इसे आप आभामण्डल यानी कि “औरा” भी कह सकते हैं। लेकिन क्या है यह आभामण्डल?

3. वैज्ञानिक रूप

वैज्ञानिक रूप
यदि वैज्ञानिक रूप से देखें तो बताया जाता है कि मनुष्य का केवल एक शरीर ही नहीं होता है, बल्कि इस भौतिक शरीर के अलावा एक प्रकाशमय एवं ऊर्जावान शरीर भी होता है। एक ऐसा शरीर जो ऊर्जा के रूप में मनुष्य के शरीर के चारो ओर 2 फीट की दूरी पर दिखाई देता है। इस शरीर को आप छू नहीं सकते, लेकिन इसकी किरणों को महसूस जरूर कर सकते हैं।

4. मानव शरीर चार प्रकार

मानव शरीर  चार प्रकार
क्या आप जानते हैं कि मानव शरीर को चार प्रकार के शरीर में विभाजित किया गया है? इसमें से एक शरीर वही है जो मनुष्य अपने जीवन के दौरान अपने साथ लेकर चल रहा है, लेकिन अन्य सभी शरीर आत्मा के अलग होने के बाद आते हैं। लेकिन आभामण्डल स्वयं भी मानव के एक शरीर का निर्माण करता है, यह शरीर सूक्ष्म शरीर है इसीलिए दिखाई नहीं देता।

5. जीव जंतु

जीव जंतु
केवल मनुष्य ही क्यों, बल्कि अन्य जीव जंतुओं के पास भी एक सूक्ष्म शरीर होता है जो उनके आभामण्डल को परिभाषित करता है। चाहे मनुष्य हो या अन्य कोई भी जीव हो, हर किसी का अपना औरा होता है। यह औरा विभिन्न रंगों की किरणों के साथ मनुष्य के आसपास चक्रिय आकार में घूमता है।

6. आभामण्डल का आकार

आभामण्डल का आकार
आभामण्डल का आकार तथा उसका रंग एक मनुष्य के बारे में कई चीजों की जानकारी देता है। क्या आप जानते हैं कि इस आभामण्डल की मदद से एक इंसान के चरित्र, उसके विचारों तथा उसकी सोच का पता चलता है। यह आभामण्डल बताता है कि आपके सामने खड़ा इंसान किस प्रकार की सोच में गुम है।

7. आभामण्डल में मौजूद रंग

आभामण्डल में मौजूद रंग
क्या वह वास्तव में आपके साथ है भी या अपनी ही किसी दुनिया में खोया है। आभामण्डल में मौजूद रंग हमें एक इंसान के चरित्र का जो वर्णन देते हैं वह काफी दिलचस्प है। माना जाता है कि यदि एक इंसान देखने में काफी आकर्षक लग रहा है और तरोताजा प्रतीत होता है तो इसका अर्थ है कि वह विभिन्न रुचियों से भरा है।

8. केवल एक या दो रंग

केवल एक या दो रंग
लेकिन वहीं दूसरी ओर यदि उसका आभामण्डल केवल एक या दो रंगों को ही दर्शाता है तो इसका तात्पर्य है कि उसका जीवन केवल कुछ ही विषयों के आसपास घूम रहा है।

9. आध्यात्मिक स्वास्थ्य

आध्यात्मिक स्वास्थ्य
यह रंग हमारे आभामण्डल को परिभाषित करते हैं। क्या आप जानते हैं कि यही आभामण्डल आपके आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालता है, लेकिन कैसे? इसका जवाब आभामण्डल में मौजूद रंगों द्वारा मिलता है। जिससे आप ना केवल अपने बल्कि किसी और के चरित्र को भी पहचान सकते हैं। लेकिन क्या आपने कभी जाना है कि आपका आभामण्डल आपके बारे में क्या कहता है?

10. औरा में मौजूद रंग

औरा में मौजूद रंग
आप कैसे खुद के आभामण्डल को जान सकते हैं इसके लिए इसका सही ज्ञान होना आवश्यक है। यदि आप अपने आभामण्डल को पहचान पाएंगे तो आप किसी के भी आभामण्डल को विस्तारित करने के योग्य होंगे। जैसा कि उपरोक्त पंक्तियों में बताया गया है कि हमारे औरा में मौजूद रंग ही उस आभामण्डल को परिभाषित करते हैं, तो आइए जानें कौन से रंग क्या कहते हैं:

11. लाल रंग

लाल रंग
यदि आपको आभामण्डल का रंग लाल या गहरा प्रतीत हो है तो इसका मतलब है कि वह इंसान बहुत जल्दी क्रोधित हो जाता है। ऐसे इंसान जब गुस्से में होते हैं तो वे नहीं जानते कि वे क्या बोल रहे हैं। इनके गुस्से की कोई सीमा नहीं होती और जब वे क्रोधित होते हैं तो कुछ भी सोचते-विचारते नहीं हैं।

12. नारंगी रंग

नारंगी रंग
यदि किसी व्यक्ति का आभामण्डल आपको नारंगी रंग का लगता है तो ऐसे लोग रचनात्मक स्वभाव के होते हैं। इन्हें भावनात्मक भी माना जाता है। अगला रंग है पीला यह बुद्धिमानी का प्रतीक है।

13. पीला रंग

पीला रंग
कहते हैं जिस व्यक्ति के आभामण्डल में पीले रंग का आभास हो उनका मस्तिष्क काफी सचेत रहता है, लेकिन यदि यही पीला रंग गहरा हो जाए तो यह अच्छा संकेत नहीं है।

14. हरा रंग

हरा रंग
इसके बाद आभामण्डल में यदि हरा रंग दिखाई दे तो ऐसा इंसान काफी शांत स्वभाव का होता है। एक बाग में दिखने वाली हरियाली की तरह ही ऐसे इंसान के चेहरे पर आप संतुष्टि देख सकते हैं।

15. काला रंग

काला रंग
परंतु आभामण्डल में काला रंग दिखाई दे तो यह जीवन की असंतुष्टि की व्याख्या करता है। ऐसे लोग जीवन में खुश नहीं होते। इनका मानसिक स्वास्थ्य भी स्थिर नहीं रहता।

16. नीला रंग

नीला रंग
यानी कि परेशानियां इनके जीवन का एक विशेष भाग बनकर बैठी हैं। माना जाता है कि काले आभामण्डल वाले लोग ही नशीले पदर्थों का सबसे ज्यादा सेवन करते हैं। लेकिन दूसरी ओर यदि किसी इंसान के आभामण्डल में नीले रंग की छाया नज़र आए तो यह सबसे अच्छा रंग माना जाता है।

17. उत्साहित एवं कुशल

उत्साहित एवं कुशल
ऐसे व्यक्ति बेहद उत्साहित एवं कुशल स्वभाव के होते हैं। लेकिन बाकी रंगों की तरह ही यदि इस रंग पर भी काला या मटमैला रंग आ जाए, तो यह व्यक्ति को चिंता में डाल देता है। उसका उत्साह अति उत्साह बनकर उसी के जीवन को ग्रस्त करने में लग जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं क्कि यदि आपका आभामण्डल आपको बुरा प्रतीत होता है तो आप स्वयं उसका हल भी निकाल सकते हैं।

Wednesday, March 15, 2017

रेकी या स्पर्श-चिकित्सा

रेकी क्या है
रेकी या स्पर्श चिकित्सा में हाथों के द्वारा एक विशेष रीति से रोगी अथवा रोग से ग्रसित अंग को ब्रह्माण्डीय जीवन ऊर्जा या दिव्य प्राण शक्ति देकर बीमारी को दूर किया जाता है। रेकी शब्द दो जापानी शब्दों ' रे ' और ' की ' से बना है। ' रे ' का मतलब ब्रह्म बोध या दिव्य ज्ञान और ' की' का मतलब जीवन ऊर्जा होता है (संस्कृत में की को प्राण कहते हैं)। यही जीवन ऊर्जा हमारे शरीर को चेतना प्रदान करती है और इस पूरे ब्रह्माण्ड में हमारे चारों तरफ विद्यमान है। रेकी शरीर, मन और आत्मा में सामंजस्य स्थापित करती है। जब हम बुजुर्गों के पैर छूते हैं और वे सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देते हैं, वह भी रेकी का ही रूप है। वास्तव में वे हमें जीवन ऊर्जा देकर अनुग्रहीत करते हैं।
यह बहुत आसानअचूककारगर तथा एक सफल वैकल्पिक उपचार है। कोई भी व्यक्ति रेकी सीख सकता है। यह आवश्यक नहीं कि रेकी सीखने वाला व्यक्ति बहुत बुद्धिमानयोगीसंत-सन्यासी या आध्यात्मिक क्षेत्र का पहुंचा हुआ व्यक्ति हो। अभ्यास और एकाग्रता के बल पर कोई भी इसे सीख सकता है। न ही इसे सीखने के लिए उम्र का बंधन है। इसे सीखने के लिए कई वर्षों के लम्बे अभ्यास की आवश्यकता भी नहीं होती। रेकी एक ऐसा अद्भुत तरीका हैजिसमें रोगी और रोग से ग्रसित अंग को रेकी उपचारक द्वारा दिव्य प्राण ऊर्जा देकर बीमारी से छुटकारा दिलाया जाता है।
इतिहास
आध्यात्मिक शक्तियों से हमारा देश सर्वोपरी है। हजारों वर्ष पूर्व भारत में स्पर्श चिकित्सा का ज्ञान था। अथर्ववेद में इसके सबूतपाए गए हैंकिंतु गुरु-शिष्य परंपरा के कारण यह विद्या मौखिक रूप से ही रही। लिखित विद्या न होने के कारण धीरे-धीरे यह लुप्त होत चल ग 
2500  वर्ष पहले भगवान बुद्ध ने य विद्या अपने शिष्यों को सिखाई ताकि देशाटन के समय जंगलों में घूमते हुए उन्हें चिकित्सा सुविधा का अभाव न हो और वे अपना उपचार कर सकें। भगवान बुद्ध की 'कमल सूत्रनामक पुस्तक में इसका कुछ वर्णन है।
15 अगस्त, 1865 में जन्मे जापान के डॉ. मिकाओ उसुई ने इस विद्या की पुनः खोज की और आज यह विद्या रेकी के रूप में पूरे विश्व में फैल गई है। डॉ. मिकाओ उसुई की इस चमत्कारिक खोज ने 'स्पर्श चिकित्साया रेकी के रूप में संपूर्ण विश्व को चिकित्सा के क्षेत्र में एक नई दिशा प्रदान की है।
रेकी उपचार
रेकी उपचार के लिए रोगी पूरे कपड़े पहने निश्चिंत होकर पलंग पर लेट जाता है या आरामदायक कुर्सी पर बैठ जाता है। रोगी से उसके अनुभव, लक्षण, रोग की अवधि, तीव्रता और आवृत्ति के बारे में जानकारी ली जाती है। उससे जीवनशैली, आहार, मानसिक तनाव आदि के बारे में भी पूछा जाता है। रेकी विशेषज्ञ रोगी के विभिन्न अंगो को अपने हाथों से स्पर्श करके उपचार करता है। हाथों के हस्त चक्र द्वारा उपचारक रोगी के प्रभामण्डल और चक्र में जीवन ऊर्जा के प्रवाह में आई रुकावट को महसूस कर लेता है। वह रोगी के प्रभामण्डल और चक्रों में ऊर्जा प्रवाहित करता है। यह ऊर्जा अंतःस्रावी ग्रंथियों, अंगों और न्यूरोट्रोंसमीटर्स में आई रुकावट को दूर करती है तथा नकारात्मकता को निकाल देती है। कभी-कभी यह नकारात्मकता निकलते समय तकलीफ बढ़ा सकती है लेकिन ज्यों ही सारी नकारात्मकता निकल जाती है, स्थिति सुधर जाती है। यह उपचार लगभग एक घन्टे या थोड़ा ज्यादा चलता है। हाथों का स्पर्श बहुत हल्का और कोमल होता है और कोई दबाव नहीं डाला जाता है। इसलिए इसे किसी भी उम्र या रोग में दिया जा सकता है। कई बार तो हाथों को त्वचा से दूर रख कर ही उपचार दिया जाता है। जीवन ऊर्जा को जहाँ भी आवश्यकता हो वहीं केन्द्रित कर दिया जाता है। रोगी को हल्का सी गर्मी  या सिरहन महसूस होती है। रेकी उपचार बहुत सौम्य  और आरामदायक अनुभव होता है। जब तक रोगी इस ब्रह्माण्डीय जीवन ऊर्जा को ग्रहण नहीं करना चाहता तब तक यह ऊर्जा उसके शरीर में प्रवेश नहीं कर पाती है, इसलिए रोगी का विश्वास, सहमति और सहयोग बहुत जरूरी है।
रेकी शक्तिशाली और सौम्य उपचार
रेकी उपचार की विशेषता यह है कि इसमें जीवन ऊर्जा भौतिक, भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर उपचार करती है। यह लगभग सभी रोगों जैसे श्वासकष्ट, सिरदर्द, ऐलर्जी, साइनोसाइटिस, अस्थिसंध-शोथ, रक्तचाप, कमरदर्द, सर्वाइकल स्पोन्डिलाइटिस, जुकाम, मधुमेह, पेप्टिक अल्सर, स्क्लिरोडर्मा, पाइल्स, हिपेटाइटिस, माइग्रेन, माहवारी विकार आदि में काम करती है। यह सभी तरह के दर्द में आश्चर्यजनक रूप से लाभप्रद है। यह चिरकारी भौतिक और मानसिक रोगों के उपचार में  बहुत प्रभावशाली साबित हुई है।
रेकी के लाभ
  • यह शरीर में ऊर्जा के उन्मुक्त प्रवाह में आई रुकावट को दूर करती है।
  • यह शरीर, प्रभामण्डल और चक्रों के विशुद्ध करती है।
  • अतीद्रिंय मानसिक शक्तियों को बढ़ाती है।
  • ध्यान लगाने के लिए सहायक होती है।
  • शरीर में व्याप्त नकारात्मकता को दूर करती है।
  • शरीर की रक्षाप्रणाली को प्रभावी बनाती है।
  • शरीर को शान्त करती है।
  • शरीर और मन दोनों का उपचार करती है।
  • अहम को खत्म करती है।
  • शरीर की स्वउपचार शक्ति को बढ़ाती है।
  • कुण्डलिनी शक्ति के मार्ग को साफ करती है।
  • मानसिक शक्ति को बढ़ाती है।
  • समक्ष एवं परोक्ष उपचार करती है।

रेकी कैसे कार्य करती है

शरीर में जीवन ऊर्जा का स्वचछंद प्रवाह ही अच्छे स्वास्थ्य का आधार होता है। स्वस्थ रहने के लिए मन की भूमिका अहम होती है। हमारा मन पांचों इन्द्रियों द्वारा एकत्रित बाहरी सूचना तथा ऊर्जा का विश्लेषण करता है और उसे प्रभामण्डल और चक्रों द्वारा अवचेतन मन में प्रवाहित करता है। इसलिए मन को छठी इन्द्री कहते है। यदि मन शान्त है और तनावमुक्त है, तो ऊर्जा का प्रवाह अविरत होता रहता है। इस तरह पांचों इन्द्रियों द्वारा एकत्रित बाहरी सूचनाएं मन और शरीर में सामंजस्य बनाये रखने में अहम भूमिका रखती हैं। ऊर्जा के प्रवाह में रुकावट आने से कोई चक्र असन्तुलित हो जाता है, जिसके फलस्वरूप अन्य चक्र, अंतःस्रावी ग्रंथियां और पांचों तत्व भी असन्तुलित हो जाते है। जिससे उन चक्रों से नियंत्रित कोई अंग विशेष या सम्पूर्ण शरीर निष्क्रिय और रोगग्रस्त हो जाता है। हर चक्र एक अंतःस्रावी ग्रंथि का भी नियंत्रण करता है, जो अमुक हार्मोन का स्रवण करती हैं। ये हार्मोन शरीर के खास अंगों के क्रिया-प्रणाली को संतुलित रखते हैं। रेकी उपचार में उपचारक अपने हाथों द्वारा ब्रह्माण्डीय जीवन ऊर्जा को रोगी के प्रभामण्डल और चक्रों में प्रवाहित करता है।
रेकी की विशेषताएं
  • जहाँ दवाओं के दाम आसमान को छू रहे हैं, वहीं रेकी बहुत कम खर्चीला उपचार है।
  • कोई पार्ष्व-प्रभाव नहीं हैं।
  • इसे अन्य उपचार (एलोपेथी, आयुर्वेद, हाम्योपेथी आदि) के साथ लिया जा सकता है।
  • यह रोग के मूलभूत कारण को दूर करती है।
  • रेकी बिना किसी दवा के पूरे शरीर का उपचार करती है।
  • चूँकि रेकी का प्रयोग करने वाला गुरू केवल उसका वाहक होता हैउसका मूल स्रोत नहींअतः उपचार करने से रेकी उपचारक की अपनी ऊर्जा कम नहीं होतीअपितु उसके माध्यम से रेकी दी जाने के कारण रोगी की चिकित्सा के साथ-साथ उसकी अपनी भी चिकित्सा होती है और उपचारक का ऊर्जा स्तर बढ़ता है।
  • यह बेचैन के लिए फूलों की सेज हैनिराश के लिए आशा का दीप हैऔर स्वस्थ्य के लिए कायाकल्प पेय है।
रेकी प्रशिक्षण
शक्तिपात
रेकी के माध्यम से हम मानव अस्तित्व में व्याप्त उर्जा को न सिर्फ नियंत्रित कर सकते हैं बल्कि रेकी हमारे शरीरमस्तिष्कभावनाओ एवं आध्यात्मिक स्तर पर भी सकारात्मक असर डालती है। रेकी प्रशिक्षण में रेकी प्रशिक्षक प्रभिक्षु के चक्र खोलता है और उसमें स्थाई रूप से असिमित ब्रह्माण्डीय जीवन ऊर्जा का संचार करता है। इसे शक्तिपात कहते हैं और यह तीन चरणों में की जाती है। इसके बाद यह शक्ति जीवनपर्यंत तथा हर समय व्यक्ति के पास रहती है। इससे वह स्वयं का और दूसरों का उपचार कर सकता है।  रेकी साधक  की आत्मा पवित्र होनी चाहिये। शान्त, निष्कपट और सत्यवादी साधक  अच्छे उपचारक बनते हैं। चक्रों पर ध्यान लगाने से साधक  की जीवन ऊर्जा को प्रसारित करने की क्षमता बहुत बढ़ जाती है। इसे चक्र, प्रभामण्डल, आत्मा और ब्रह्माण्डीय विज्ञान का पूरा ज्ञान होना भी जरूरी है।
पहला चरण
यह 14-16 घंटे की प्रशिक्षण प्रक्रिया है जिसमे साधक  को रेकी की सैधान्तिक एवं व्यवहारिक जानकारी दी जाती है प्रायः यह सम्पूर्ण प्रक्रिया दिनों में की जाती है एवं पूरी प्रक्रिया में साधक  पर बार शक्तिपात द्वारा सहस्रार, आज्ञा, विशुद्ध तथा अनाहत चक्रों को खोला जाता है और साधक  को स्वयं तथा दूसरे का उपचार करने की योग्यता दी जाती है। शक्तिपात के बाद साधक में जीवन ऊर्जा का स्पन्दन बढ़ जाता है, शरीर में आरोग्य ऊर्जा अवस्थित हो जाती है, नकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है और शारीरिक रोग ठीक होने लगते हैं।  इसे सीखने के बाद साधक  कुछ महीनों तक इसका अभ्यास  करता है।
दूसरा चरण
इस प्रशिक्षण में भी लगभग दिनों का समय लगता है। इस चरण में साधक को प्रशिक्षण को आगे बढ़ाते हुए रेकी के परम्परागत और गैर-परम्परागत चिन्ह सिखाये जाते हैं। ये पवित्र चिन्ह विशेष प्रयोजन हेतु आरोग्य ऊर्जा को केन्द्रित करते हैं। इनका प्रयोग उपचार और शक्तिपात दोनों के लिए किया जाता है। ये तृतीय नेत्र को खोल देते हैं जिससे कई मानसिक शक्तियां विकसित हो जाती हैं और दूरस्थ उपचार करना भी सम्भव हो जाता है।
तृतीय चरण
तृतीय चरण में छात्र रेकी में महारत हासिल कर लेता है और इस काबिल हो जाता है की दूसरों को रेकी सिखला सके।  रेकी के इस चरण रेकी की एक अलग ही अध्यात्मिक धारा की शुरुआत है जहाँ से साधक को रेकी में दक्ष होकर समाज के दूसरे लोगो तक रेकी का प्रचार-प्रसार एवं प्रशिक्षण का कार्यभार संभालना होता है जो आगे चलकर रेकी गुरू और उसके बाद महागुरू के रूप में जाना जाता है। रेकी चिकित्सा का लाभ मनुष्य एवं अन्य जीवित प्राणियों (जैसे जानवर) के अलावा,पेड़-पौधे एवं निर्जीव वस्तुओं  जैसे पृथ्वी इत्यादि को भी मिलता है। इनके अलावा यह रिश्तों में आई दूरी या खटास को भी कम करता है या पूरी तरह से मिटाता है।

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किसी भी तरह के रोग होने के 3 कारण होते हैं

आयुर्वेद और आयुर्विज्ञान दोनों ही चिकित्साशास्त्र हैं, परंतु व्यवहार में चिकित्साशास्त्र के प्राचीन भारतीय ढंग को आयुर्वेद कहते हैं और ऐलोपैथिक प्रणाली (जनता की भाषा में "डाक्टरी') को आयुर्विज्ञान का नाम दिया जाता है।
 
आयुर्वेद में प्राकृतिक चिकित्सा का महत्व
परिचय- आयुर्वेद के अनुसार किसी भी तरह के रोग होने के 3 कारण होते हैं-
1. वात:- शरीर में गैस बनना।
2. पित्त:- शरीर की गर्मी।
3. कफ:- शरीर में बलगम बनना।
नोट:- किसी भी रोग के होने का कारण एक भी हो सकता है और दो भी हो सकता है या दोनों का मिश्रण भी हो सकता है या तीनों दोषों के कारण भी रोग हो सकता है।

1. वात होने का कारण :-
गलत भोजन, बेसन, मैदा, बारीक आटा तथा अधिक दालों का सेवन करने से शरीर में वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
दूषित भोजन, अधिक मांस का सेवन तथा बर्फ का सेवन करने के कारण वात दोष उत्पन्न जाता है।
आलसी जीवन, सूर्यस्नान, तथा व्यायाम की कमी के कारण पाचन क्रिया कमजोर हो जाती है जिसके कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
इन सभी कारणों से पेट में कब्ज (गंदी वायु) बनने लगती है और यही वायु शरीर में जहां भी रुकती है, फंसती है या टकराती है, वहां दर्द होता है। यही दर्द वात दोष कहलाता है।
2. पित्त होने का कारण:-
पित्त दोष होने का कारण मूल रुप से गलत आहार है जैसे- चीनी, नमक तथा मिर्चमसाले का अधिक सेवन करना।
नशीली चीजों तथा दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण पित्त दोष उत्पन्न होता है।
दूषित भोजन तथा केवल पके हुए भोजन का सेवन करने से पित्त दोष उत्पन्न होता है।
भोजन में कम से कम 75 से 80 प्रतिशत क्षारीय पदार्थ (फल, सब्जियां इत्यादि अपक्वाहार) तथा 20 से 25 प्रतिशत अम्लीय पक्वाहार पदार्थ होने चाहिए। जब इसके विपरीत स्थिति होती है तो शरीर में अम्लता बढ़ जाती हैं और पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है।
3.  कफ होने का कारण:-
तेल, मक्खन तथा घी आदि चिकनाई वाली चीजों को हजम करने के लिए बहुत अधिक कार्य करने तथा व्यायाम की आवश्यकता होती है और जब इसका अभाव होता है तो पाचनक्रिया कम हो जाती है और पाचनक्रिया की क्षमता से अधिक मात्रा में चिकनाई वाली वस्तुएं सेवन करते है तो कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
रात के समय में दूध या दही का सेवन करने से कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
वात, पित्त और कफ के कारण होने वाले रोग निम्नलिखित हैं-
वात के कारण होने वाले रोग :-
          अफारा, टांगों में दर्द, पेट में वायु बनना, जोड़ों में दर्द, लकवा, साइटिका, शरीर के अंगों का सुन्न हो जाना, शिथिल होना, कांपना, फड़कना, टेढ़ा हो जाना, दर्द, नाड़ियों में खिंचाव, कम सुनना, वात ज्वर तथा शरीर के किसी भी भाग में अचानक दर्द हो जाना आदि।
पित्त के कारण होने वाले रोग :-
          पेट, छाती, शरीर आदि में जलन होना, खट्टी डकारें आना, पित्ती उछलना (एलर्जी), रक्ताल्पता (खून की कमी), चर्म रोग (खुजली, फोड़े तथा फुन्सियां आदि), कुष्ठरोग, जिगर के रोग, तिल्ली की वृद्धि हो जाना, शरीर में कमजोरी आना, गुर्दे तथा हृदय के रोग आदि।
कफ के कारण होने वाले रोग :-
         बार-बार बलगम निकलना, सर्दी लगना, श्वसन संस्थान सम्बंधी रोग (खांसी, दमा आदि), शरीर का फूलना, मोटापा बढ़ना, जुकाम होना तथा फेफड़ों की टी.बी. आदि।

वात से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-
आहार चिकित्सा :-
वात से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में रेशेदार भोजन (बिना पकाया हुआ भोजन) फल, सलाद तथा पत्तेदार सब्जियों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
मुनक्का अंजीर, बेर, अदरक, तुलसी, गाजर, सोयाबीन, सौंफ तथा छोटी इलायची का भोजन में अधिक उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में लहसुन की 2-4 कलियां खानी चाहिए तथा अपने भोजन में मक्खन का उपयोग करना चाहिए इसके फलस्वरूप वात रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
उपवास :-
            वात रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले कुछ दिनों तक सब्जियों या फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके बाद अन्य चिकित्सा करनी चाहिए।
योगासन 
प्राणायाम

पित्त से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-
आहार चिकित्सा :-
पित्त रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सब्जियों तथा फलों का रस पीना चाहिए।
पित्त रोग से पीड़ित रोगी को भूख न लग रही हो तो केवल फलों का रस तथा सब्जियों का रस पीना चाहिए और सलाद का अपने भोजन में उपयोग करना चाहिए। इसके फलस्वरूप उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
रोगी व्यक्ति को पूरी तरह स्वस्थ होने तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।
पित्त रोग से पीड़ित रोगी को खट्टी, मसालेदार, नमकीन चीजें तथा मिठाईयां नहीं खानी चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से पित्त रोग और बिगड़ जाता है।
पित्त के रोगी के लिए गाजर का रस पीना बहुत ही लाभकारी होता है, इसलिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में कम से कम 1 गिलास गाजर का रस पीना चाहिए।
अनार, मुनक्का, अंजीर, जामुन, सिंघाड़ा, सौंफ तथा दूब का रस पीना पित्त रोगी के लिए बहुत ही लाभकारी होता है।
पित्त रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में लहसुन की 2-4 कलियां खाने से बहुत लाभ मिलता है।
सोयाबीन तथा गाजर का सेवन प्रतिदिन करने से वात रोग जल्द ही ठीक होने लगता है।
उपवास :-
           पित्त रोग से पीड़ित रोगी को इलाज करने के लिए सबसे पहले कुछ दिनों तक सब्जियों तथा फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए और इसके बाद अन्य चिकित्सा करनी चाहिए।
योगासन 
प्राणायाम
कफ से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-
आहार चिकित्सा :-
कफ के रोग से पीड़ित रोगी को प्राकृतिक चिकित्सा के दौरान सबसे पहले चिकनाई वाले पदार्थ, दूषित भोजन, तली-भुनी चीजों आदि का सेवन नहीं करना चाहि क्योंकि इन चीजों का उपयोग कफ रोग में बहुत हानिकारक रहता है।
कफ से पीड़ित रोगी को दूध तथा दही वाले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से रोगी की स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।
कफ रोग से पीड़ित रोगी को दूध नही पीना चाहिस और अगर उसका मन दूध पीने को करता है तो दूध में सोयाबीन डालकर सेवन करना चाहिए।
कफ रोग से पीड़ित रोगी को ताजे आंवले का रस प्रतिदिन सुबह के समय में पीना चाहिए जिसके फलस्वरूप उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। यदि आंवले का रस न मिल रहा हो तो सूखे आंवले को चूसना चाहिए।
मुनक्का, कच्ची पालक, अंजीर तथा अमरूद का सेवन कफ रोग में बहुत अधिक लाभदायक होता है।
अदरक, तुलसी अंजीर तथा सोयाबीन का कफ रोग में प्रयोग करने से रोगी को बहुत आराम मिलता है।
लहसुन तथा शहद का प्रयोग भी कफ रोग में लाभदायक होता है और इससे रोगी का कफ रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
उपवास :-
          कफ के रोग से पीड़ित रोगी को इलाज करने के लिए सबसे पहले कुछ दिनों तक हरी सब्जियों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके बाद अन्य चिकित्सा करनी चाहिए। इसके फलस्वरूप उसका यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

अल्टरनेटिव मेडिसिन पर इतनी चिल्लपों क्यों, जब न्यायालय ने इसे माना है वैध?

मधेपुरा के फर्जी डॉक्टरों के खिलाफ अभियान क्या चला, मानों कई लोगों ने इसमें राजनैतिक हित साधना शुरू कर दिया.
      खबर है कि मधेपुरा के आईएमए ने भी अल्टरनेटिव मेडिसिन की डिग्री पर विवादित बयान देते हुए इसे वैध नहीं मानते हुए कुतर्क पेश किया है कि यदि ये वैध होता तो डिग्रीधारी सरकारी नौकरी भी पा रहे होते.
      दरअसल इन दिनों ताजा विवाद को कुछ ज्यादा ही तूल दिया जा रहा है जिसके बारे में लोग अब तरह-तरह की बातें करने लगे हैं. आईएमए के विवादित बयान पर प्रतिकिया देते हुए मधेपुरा के डॉक्टर ए. के. आनंद ने आईएमए के बयान को पूर्वाग्रह से ग्रसित माना है. उन्होंने कहा है कि वर्तमान आईएमए के अध्यक्ष ने सूचना के अधिकार के तहत सिविल सर्जन, मधेपुरा द्वारा गठित जांच कमिटी (डा. संध्या कुमारी, अल्टरनेटिव मेडिसिन) की जांच रिपोर्ट ज्ञापांक 301 दिनांक 13.08.2008 प्राप्त कर चुके हैं. जिसमें साफ़ लिखा है कई वे प्रैक्टिस कर सकते हैं. प्रैक्टिस के रूप में वे परामर्शदाता का कार्य एवं उपचार कर सकते हैं, परन्तु ऑपरेशन से सम्बंधित कार्य नहीं कर सकते हैं.

कुछ तथ्य अल्टरनेटिव मेडिसिन के बारे में: दरअसल अल्टरनेटिव मेडिसिन चिकित्सा शास्त्र की वो विधा है जो पूर्णत: वैज्ञानिक प्रक्रिया पर आधारित नहीं होने के बावजूद सदियों से कई बीमारियों के इलाज में कारगर साबित हो रही है. इस पारंपरिक विधा में नेचुरोपैथीएक्यूपंक्चरट्रेडिशनल चाइनीज मेडिसीनआयुर्वेदिक मेडिसिनक्रिश्चियन फेथ हीलिंग आदि आते हैंजिनपर बहुत से रोगियों को भरोसा होता है.
      भारत में अल्टरनेटिव मेडिसिन सिस्टम को बढ़ावा देने के लिए सेन्ट्रल गवर्नमेंट एक्ट XXI of 1860 के तहत कोलकाता में इन्डियन बोर्ड ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन्स स्थापित है जहाँ से अल्टरनेटिव मेडिसिन से सम्बंधित कई कोर्सेज कराये जाते हैं. इसके अलावा तामिलनाडु में महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी के सौजन्य से तथा कर्नाटक स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी के द्वारा भी अल्टरनेटिव मेडिसिन से सम्बंधित कई तरह के कोर्स कराये जाते हैं और डिग्री दी जाती है. इसकी सबसे खास बात यह है कि अल्टरनेटिव सिस्टम ऑफ मेडिसिन्स के तहत प्रैक्टिस करने के लिए मेडिकल काउन्सिल ऑफ इंडिया से किसी रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता (letter No. MCI-34(1) / 96-Med. / 10984) नहीं है.
      अल्टरनेटिव मेडिसिन में दक्षता प्राप्त व्यक्ति पूरे भारत में प्रैक्टिस कर सकता है और जहाँ मदर टेरेसा से लेकर दलाई लामा तक जैसे महान लोगों ने अल्टरनेटिव मेडिसिन की तारीफ़ की है वहीँ सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट पश्चिम बंगालहाई कोर्ट कर्नाटक, हाई कोर्ट दिल्ली आदि ने भी इसकी वैधता को स्वीकारा है.
अल्टरनेटिव मेडिसिन को तो छोड़िये, गाँव के आरएमपी भी हैं वैध: सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में रूरल मेडिकल प्रैक्टिशनर (आरएमपी) को भी एलोपैथ के जीवन रक्षक दवाइयों के 42 ड्रग ग्रुप पर प्रैक्टिश करने की छूट दी है. बात भी सही है, मानिए इस बात को कि सुदूर गाँव में यदि ये आरएमपी न हों, तो ग़रीबों की जान शहर के बड़े डॉक्टरों के भरोसे नहीं बचाई जा सकती है.

सिविल सर्जन ने भी कहा है कि ये कर सकते हैं प्रैक्टिस: हाल में ही 28 अक्तूबर को डा० ए. के. आनंद के क्लिनिक को सील करने के दौरान मधेपुरा के सिविल सर्जन डा० एन. के. विद्यार्थी ने डा० संध्या कुमारी के मामले पर कहा था कि उनके पास एमबीबीएस (ए.एम.) की डिग्री है और वे उससे सम्बंधित प्रैक्टिस कर सकती है. 2008 में भी आईएमए ने डा० संध्या कुमारी के बारे में सूचना के अधिकार के तहत पूरी जानकारी प्राप्त कर ली थी.
      ऐसी स्थिति में यदि आईएमए के द्वारा फिर से अल्टरनेटिव मेडिसीन को अवैध करार देने की बात आती है तो ये न सिर्फ न्यायालय के आदेश की अनदेखी है, बल्कि सच से भागने जैसा है.
      सुनिए इस वीडियो में अल्टरनेटिव मेडिसिन के बारे में क्या कहा सिविल सर्जन ने, यहाँ क्लिक करें.

Tuesday, March 14, 2017

रेकी - एक आध्यात्मिक ईश्वरीय ऊर्जा शक्ति

रेकी अर्थात ऊर्जा - आध्यात्मिक ईश्वरीय स्पर्श चिकित्सा पद्धति जो व्यक्ति के सभी शुभ विचारों को साकार करके चमत्कारिक ढंग से मन को आश्चर्य तथा आनंद से सराबोर कर देती है. परमात्मा की प्रार्थना में बहुत शक्ति है. इसी शक्ति को जापान में रेकी नाम से संबोधित किया जाता है. वर्तमान समय में मनुष्य चौबीसों घंटे तनाव में गुजारता है. तनाव को दूर करने की सबसे सरल विधियों में रेकी का स्थान सर्वोपरि माना गया है. सामान्य रूप से रेकी एक ऐसी स्पर्श चिकित्सा है जिसमें शारीरिक अंगों को छूकर अथवा बगैर छुए विभिन्न रोगों का उपचार सफलतापूर्वक होता है. चिकित्सा की इस विधा में औषधि के रूप में ब्रह्माण्ड में व्याप्त संजीवनी प्राण ऊर्जा का उपयोग किया जाता है, उपचार की प्रक्रिया में ऊर्जा का प्रवाह रेकी मास्टर के हाथों में होकर रोगी के शरीर में (रोगी की ऊर्जा ग्रहण क्षमता के अनुसार) पहुँचता है एवं कुछ ही समय पश्चात् रोगी व्यक्ति पहले तो स्वस्थ और संयमितता का अनुभव करता है और अंत में उसे आनंद की सुखद अनुभूति होने लगती है. रेकी का असली उदगम स्थल भारत है. यहाँ से यह तिब्बत और चीन होती हुई जापान तक पहुँची है. जापान में इसे पुनः खोजने का काम जापान के संत डॉक्टर मिकाओ उसुई ने अपने जीवनकाल 1869-1926 में किया था.
विश्व के सभी देशों में आज भी मान्यता है कि साधु-संतों के आशीर्वचन, उनका सान्निध्य तथा आशीष पाकर मनुष्य को बीमारियों से मुक्ति सहज ही मिल जाती है. डॉक्टर मिकाओ उसुई को भी पूरा विश्व इसीलिए जानता है कि उन्होंने बिना दवा-गोली इंजेक्शन के मात्र स्पर्श एवं संकल्प शक्ति से जटिलतम रोगों का निदान करने के लिए रेकी स्पर्श चिकित्सा से दुनिया को परिचित कराया, हमारे देश में 1980 से रेकी चिकित्सा जारी है. हालांकि इसे शासकीय मान्यता प्राप्त नहीं है फिर भी देश के शहरों एवं महानगरों में इसका अत्यधिक प्रचार-प्रसार है. रेकी सीखने के लिए कुछ योग्यताएं आवश्यक हैं -
  1. व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ हो एवं उसका जीवन प्रेम और सद्भावना से भरा हो.
  2. व्यक्ति के मन में यह विश्वास होना चाहिए कि किसी भी रोग अथवा समस्या के समाधान हेतु मानव के पास ईश्वरीय शक्ति सदैव मौजूद होती है.
  3. रेकी सीखने वालों के विचारों में इमानदारी, सकारात्मकता एवं स्पष्टवादिता होना चाहिए. यह विद्या दुष्ट एवं चालाकों के लिए नहीं है.
रेकी उपचारक उपचार करने के पूर्व डॉक्टर उसुई पर ध्यान लगाकर अपने मन में सच्चे दिल से नीचे लिखी अतिरिक्त प्रार्थना करें तो उसके शरीर एवं हाथों में एक विशिष्ट आध्यात्मिक शक्ति आ जाती है. एवं रोगों को दूर करने में सहायता करती है.
"प्रभु मेरा मार्ग दर्शन करें एवं मुझे उपचारक शक्ति प्रदान करें ताकि मैं दीन दुखियों के काम आ सकूं. मैं सबके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूँ. मुझे शक्ति एवं आशीर्वाद दो. मेरा लक्ष्य मानव मात्र की सेवा करना है एवं मैं यह कार्य तभी कर पाऊंगा जब आप मुझे अपना कृपा का अंग मात्र भी प्रदान करेंगे, मैं आपको वचन देता हूँ कि आपके द्वारा दी गई शक्ति का उपयोग कभी भी अपने स्वार्थ हेतु नहीं करूंगा एवं इसका दुरूपयोग नहीं होने दूंगा."
रेकी का प्रशिक्षण रेकी के मास्टर एवं ग्राण्ड मास्टर विभिन्न चरणों में देते हैं - प्रत्येक चरण के प्रशिक्षण में लगभग आठ घण्टे का समय लगता है. ये चरण हैं -
1) फ़र्स्ट डिग्री 2) सेकण्ड डिग्री 3) थर्ड डिग्री 4) करूणा रेकी 5) मास्टर डिग्री
वैसे देखा जाए तो रेकी का वास्तविक लाभ उन्हें ही सर्वाधिक मिलता है जो सकारात्मक विचारों के साथ पूरी आस्था एवं विश्वास पूर्वक रेकी को ग्रहण करते हैं. रेकी पद्धति में रोग के निदान हेतु दवाओं की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती अर्थात् रेकी स्पर्श चिकित्सा एक सहज सरल और बिना पैसों का इलाज है. रेकी को अपनाकर अपनी और दूसरों की सामान्य तथा जटिल बीमारियों का इलाज व्यक्ति स्वयं भी कर सकता है. यदि रेकी मास्टर की आध्यात्मिक शक्ति में बल है एवं उसके उपचार का ढंग लोगों को पसंद है तो रोगी निश्चित रूप से शीघ्रातिशीघ्र निरोग हो जाता है.

संक्षेप में, रेकी आध्यात्मिक स्पर्श चिकित्सा अपने मूल रूप में एक ध्यान विधि है जो रोगी तथा उपचारक का संबंध सीधे परमात्मा से जोड़ती है.
क्या आप के लिए देख रेकी उपचार के लिए आपको एक रेकी  मास्टर बनने में सहायता पाठ्यक्रमों मैं क्या आप अनुभव और प्रमाणीकरण प्राप्त करने में अलग अलग तरीकों के लिए सब से अधिक देखा है, लेकिन सबसे अच्छी तरह से समझ नहीं कर सकते बाहर इस अनुच्छेद में मैं तुम्हें समझाने की क्या यह एक महान रेकी मास्टर आप का सबसे अच्छा करने में मदद करेगा चिकित्सा की इस कला में एक समर्थक बन कार्यक्रम दिखाने के रूप में अच्छी तरह से बन जाता होगा.मैं सब से अधिक खोज की है के लिए एक निश्चित है कि मुझे ऊर्जा चिकित्सा  की कला सीखने के लिए मदद करने में . वहाँ बहुत सारे अलग पाठ्यक्रम, किताबें, वीडियो , और वहाँ बाहर विभिन्न सामग्री है रेकी एक 'जल्दी' विषय है कि आप कुछ घंटों में सीख सकते हैं नहीं है. यह एक शांत मन की आवश्यकता है.

रेकी तीन चरणों रेकी के अलग अलग संस्थाओं का इन सिद्धांतों पर अलग अलग मत हो सकता है लेकिन हर संगठन लगभग  ऐसे हीं विचारों के में सीखा जाता है लेकिन कई प्रशिक्षण संस्थाएं चार या उससे ज्यादा चरणों में इसे सिखलातें हैं। अगर कोई व्यक्ति रेकी सीखना चाहता है तो निम्न तीन चरणों में किसी प्रशिक्षक द्वारा इसे सीखा जाता है। इसे सीखने के बाद छात्र कुछ महीनों तक इसका अभ्यास  करता है।  

रेकी का पहला डिग्री : 

शुरुआत में, रेकी सीखने के प्रशिक्षण के दौरान पहला पूरा दिन लग सकता है या दो आधे-आधे दिन लग सकते हैं।  शुरुआत में प्रशिक्षक छात्रों को रेकी का इतिहास बताता है तथा एकाध बार हाथों से अभ्यास करवाकर दिखलाता है। शरीर के भिन्न-भिन्न हिस्सों पर हाथ रखने से क्या-क्या परिणाम हो सकते हैं, इस बारे में भी बताया जाता है। पहली दीक्षा के बाद छात्र आत्म-चिकित्सा का अभ्यास कर सकने के अलावा हाथों से दूसरों का भी उपचार शुरू कर सकते हैं

रेकी का दूसरा डिग्री : 

जो रेकी का पहला डिग्री पूरा कर लेते हैं और दूसरा डिग्री लेने की इच्छा जताते हैं उन्हें उनका प्रशिक्षक पुनः कुछ बातें सिखलाने लगता है। छात्र दूर से भी किसी रोगी का उपचार कर सकें इसके लिए उन्हें कुछ खास प्रतीकों एवं चिन्हों के बारे में जानकारी दी जाती है। दूसरे डिग्री का प्रशिक्षण लेने के बाद छात्र प्रतीकों एवं चिन्हों के माध्यम से दूर से भी किसी के रोग का निदान करने में सक्षम हो जाते हैं। रेकी से वर्तमान दुःख तो दूर किये हीं जाते हैं, पुराने दुःख-तकलीफ भी इससे कम या पूरी तरह से ख़त्म किये जाते हैं। इससे भविष्य में होने वाले दुखों से भी बचाव किया जाता है।


रेकी का तीसरा डिग्री: 

इस स्थिति में छात्र रेकी में महारत हासिल कर लेता है और इस काबिल हो जाता है की दूसरों को रेकी सिखला सके। जब छात्र रेकी के दो डिग्री में सफलता पा चूका होता है और कुशलतापूर्वक रोगियों का उपचार करने लगता है तब उसे रेकी का तीसरा डिग्री सिखलाया जाता है जहाँ क्रिस्टल ग्रिड बनाना सिखलाया जाता है। क्रिस्टल ग्रिड की मदद से इस चिकित्सा को और ज्यादा शक्तिशाली बनाया जाता है एवं रोगी को और अधिक उर्जा दी जाती है। तीसरे डिग्री की रेकी चिकित्सा से दूर से इलाज में एवं निर्जीव चीजों के उपचार में भी  काफी फायदेमंद होता है।  रेकी चिकित्सा का लाभ मनुष्य एवं अन्य जीवित प्राणियों (जैसे जानवर) के अलावा, पेड़-पौधे एवं निर्जीव वस्तुओं  जैसे पृथ्वी इत्यादि को भी मिलता है। इनके अलावा यह रिश्तों में आई दूरी या दरार को भी कम करता है या पूरी तरह से मिटाता है।अगर कोई छात्र  मास्टर के स्तर तक रेकी सीखना चाहता है तो उसे विशेष प्रशिक्षण द्वारा एवं कुछ खास चिनों की पढाई करवाकर  इस विद्या में पारंगत किया जाता है

रेकी तकनीक से विभिन्नि रोगों का इलाज -

रेकी एक जापानी शब्द है, जिसका अर्थ होता है प्राण-शक्ति। रेकी एक उपचार पद्धति है जिसके द्वारा आदमी मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है। इस तकनीक के अनुसार प्रत्येक आदमी के अंदर एक प्राण चक्र होता है और पूरा जीवन इसी पर चलता है। जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो उसके अंदर यह शक्ति बहुत होती है, लेकिन धीरे-धीरे इस शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता कम हो जाती है। आदमी के नकारात्मक विचार द्वारा यह शक्ति कम होती है। रेकी तकनीक द्वारा शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। रेकी तकनीक द्वारा कई रोगों का इलाज आदमी अपने-आप कर सकता है। इस चिकित्सा पद्धति का विकास उन्नीसवीं शताब्दी में जापान में हुआ था। भारत में यह चिकित्सा पद्धति बीसवी सदी में आयी।
रेकी तकनीक द्वारा रोगों का उपचार
रेकी तकनी‍क किसी शिक्षक द्वारा जब किसी व्यक्ति को यह शिक्षा दी जाती है तब उसकी हथेलियों से स्वयं ही कॉस्मिक ऊर्जा का प्रवाह शुरू हो जाता है।
इस विधि में हाथ के स्पर्श द्वारा रोग का इलाज किया जाता है इसलिए इसे स्पर्श चिकित्सा पद्धति भी कहा जाता है।
इस तकनी‍क में उपचार के दौरान हथेलियों का दबाव देने की जरूरत नहीं होती है। शरीर में स्थिति विभिन्न चक्रों का संबंध  अलग-अलग अंगों से होता है।
रेकी तकनीक से उपचार करने वाला व्यक्ति जब इन पर अपनी हथेली से प्रेशर बनाता है तो अपने-आप कॉस्मिक ऊर्जा का प्रवाह शुरू हो जाता है और आदमी यह प्रवाह महसूस होता है।
रेकी तकनीक से उपचार में किसी एक स्थिति में हथेलियों को कम-से-कम तीन मिनट तक रखा जाता है और इसके बाद अगली स्थिति पर हथेलियों को लाया जाता है।
रेकी तकनीक का प्रयोग किसी साफ और हवादार कमरे में करना चाहिए। रोगी को ढीले कपडे पहनने चाहिए जिससे स्थिति आरामदायक हो।
रेकी तकनीक से आमतौर पर तीन दिन तक उपचार किया जाना उपयुक्त है। लेकिन रोग पुराना हो तो विशेष परिस्थितियों 21 दिन या इससे भी अधिक दिनों तक उपचार किया जा सकता है।
सिरदर्द और माइग्रेन -
सिर के दोनों ओर स्थित च्रक, माथे के आगे और पीछे के चक्र पर हथेलियों के दबाव से रेकी तकनीक द्वारा सिरदर्द और माइग्रेन का उपचार किया जाता है। इसके अलावा नाभि के ऊपर स्थित मणिपुर चक्र और जंघों के दोनों ओर ऊपर की तरफ मूलाधार चक्र पर कॉस्मिक ऊर्जा प्रवाहित करने से भी आराम मिलता है।

आंखों का दर्द – 
आंखों में दर्द होने पर या चश्मे से छुटकारा पाने के लिए आंखों को बंद करके पलकों के ऊपर हथेलियों को रखकर रेकी का उपचार कीजिए। इसके साथ ही पेट और दोनो तलवों के बीचों-बीच स्थित चक्र पर कॉस्मिक ऊर्जा को प्रवाहित करें।

साईनस या नाक में दर्द – 
नाक में दर्द होने पर या साइनस की स्थिति में जिस स्थान पर दर्द हो वहां के चक्र पर रेकी की तकनीक से उपचार करने पर आराम मिलता है।
एलर्जी – 
एलर्जी होने पर एक हाथ मणिपुर चक्र और दूसरा हाथ मूलाघार चक्र पर रखकर रेकी तकनीक से उपचार करें।

पथरी या स्टोन होने पर – 
पथरी होने पर जिस स्थान पर दर्द हो रहा हो वहां पर हथेलियों द्वारा कॉस्मिक ऊर्जा प्रवाह करें। इसके साथ ही मणिपुर चक्र, स्वाधीस्थान चक्र और मूलाघार चक्र पर रेकी तकनीक से उपचार कीजिए।
केवल प्रशिक्षित लोगों से ही रेकी की तकनीक से इलाज कराने पर लाभ मिलता है। अगर आपको रेकी की तकनीक के बारे में जानकारी है तो आप खुद से इलाज कर सकते हैं।

अपनी छिपी हुई शक्ति को पहचानिये रेकी से

18 वर्ष की उम्र में ही एक जानेमाने अध्यात्मिक हीलिंग और ट्रेनिंग सेंटर की मैनेजिंग डायरेक्टर का पद प्राप्त करना निकिता माटा के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी, 2007 से रेकी शक्ति को जन साधारण तक पहुचना निकिता के लिए चुनौती थी जिसने उसे न सिर्फ बखूभी निभाया बल्कि इसी वर्ष अपनी एम् बी ए की पढाई पूरी करने के साथ साथ अपना खुद का ट्रेनिंग सेंटर भी शुरू कर दिया। आज वो जिस मुकाम पर है वो प्रत्येक व्यक्ति के लिय प्रेरणा का स्त्रोत है।
जानते है इनकी बाते इन्ही की जुबानी
रेकी क्या है ?
मनुष्य हमेशा से सुख,शांति,समृधि व आनन्द की अभिलाषा करता है, जीवन में इन्ही को पाने का सच्चा सरल व सात्विक मार्ग रेकी हमे दिखाती है, रेकी ब्रहाण्ड की ऐसी शक्ति है जो हर इन्सान में छिपी होती है, और वो खुद इनसे अनभिज्ञ होता है। रेकी की हमारी कार्यशाला में इसी शक्ति को जाग्रत किया है।
इस क्षेत्र में आप कब और कैसे आईं ?
2006 में एक सडक दुर्घटना में मुझे सर पर चोट लगी। उस समय मेरी रेकी मास्टर डॉ रेखा सोनी ने मुझे रेकी की। उनके हाथ रखते ही मेरा दर्द गायब हो गया। तब ऐसा लगा रेकी शक्ति एक जादू है,रेकी कुछ भी क्र सकती है, इसके अच्छे अनुभव के बाद रेकी सिखने की इच्छा जाग्रत हुई।
समाज में इसका क्या योगदान है?
समाज कई परिवारों से मिलकर बनता है और परिवारों के व्यक्तियों से। रेकी के जरिये व्यक्ति अपनी नकारात्मक सोच और भावनाओ से मुक्त होता है। इसी तरह एक व्यक्ति से परिवार व समाज सकारात्मक से प्रगतिशील होते है, इस तरह से रेकी का समाज में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है।
आपकी सेवाए क्या-क्या हैं? हमारी रेकी स्पर्श चिकित्सा, रेकी दुरुस्थ उपचार चिकित्सा, मेग्नीफाईड़ हीलिंग, क्रिस्टल हीलिंग, टेरोट रीडिंग, नाड़ीशास्त्र, अंकशास्त्र,भावनाए मुक्ति तकनीक, अपनी छिपी शक्तियों को पहचानना, तनाव और क्रोध कार्पोरेट रेकी(स्कूल, कालेज, हास्पिटल, कम्पनी और सामाजिक संस्थाओ के लिए है)
आपकी भावी योजनायें क्या है?
बीमारी का मूल कर्ण हमारी शारीरिक नही बंकि मानसिक परेशानी होती है। हमारी नकारात्मक सोच एक बीमारी बन जाती है। में भविष्य में हर इन्सान को नकारात्मक सोच से मुक्त करवाना चाहती हु, जेसा की मेरे सेंटर का नाम है आरोग्य मतलब रोग खी भी नही न शारीरिक न मानसिक एक और उद्देश्य है, जैसे कार्पोरेट में भी लोग परेशानियों से घिरे रहते है, तो उनको भी मोटिवेशनल ट्रेनिग दू,जिससे की वह हमारा अभिन्न अंग बन जाए।
आप दुनिया को क्या संदेश देना चाहेंगी?
सब भाग रहे है, कोई पैसो के पीछे, कोई रिश्तो के पीछे, कोई करियर के पीछे, इस भागदौड़  में हम क्या है,यह सब भूल गए है सबसे यही कहना चाहुगी इस भाग दोड़ भरी जिन्दगी में वो है अपने अंदर छिपी शक्ति उसे पहचानो फिर आगे बढो।जिसे हम ढूंढ़ रहे है वह हमारे अंदर ही है।उसे जाग्रत करो।
आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देंगी?
अपनी सफलता का श्रेय में अपनी माता व बहन को दूंगी। उन्होंने मुझे हमेशा आगे बढने के लिए प्रेरित किया व आर्थिक व मानसिक रूप से हमेशा सहायता की है।